SSP मेरठ समेत 50 पुलिसकर्मियों पर FIR की मांग,, SC-ST कोर्ट में याचिका दाखिल, दलित समाज को बेइज्जत करने का आरोप, 3 अगस्त को सुनवाई। (ओमपाल सिंह ठाकुर)
SSP मेरठ समेत 50 पुलिसकर्मियों पर FIR की मांग,, SC-ST कोर्ट में याचिका दाखिल, दलित समाज को बेइज्जत करने का आरोप, 3 अगस्त को सुनवाई।
मेरठ (ओमपाल सिंह ठाकुर) उत्तर प्रदेश के जिला मेरठ में आठ जुलाई को कलेक्ट्रेट पर हुए दलित समाज के प्रदर्शन और उसके बाद हुई पुलिस कार्यवाही का मामला अब अदालत पहुंच गया है। दलित अधिवक्ता अनिल प्रधान ने विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी कोर्ट में याचिका दाखिल कर एसएसपी अविनाश पांडे और एसपी देहात अभिजीत कुमार के साथ 50 अज्ञात पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराएं जाने की मांग की। याचिका में पुलिस अधिकारियों पर दलित समाज के लोगों के साथ अभद्रता, मानवाधिकारों का उल्लंघन और जातिवाद मानसिकता से कार्यवाही करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अधिवक्ता अनिल प्रधान का आरोप है कि ललिता गौतम हत्याकांड की विवेचना में पुलिस ने निष्पक्षता से जांच नहीं कर आरोपियों को बचाने का प्रयास किया है, इसी के विरोध में दलित समाज के लोगों ने आठ जुलाई 2026 को जिलाधिकारी से मिलकर अपनी बात कहने के लिए पहुंचे थे। आरोप हैं कि पुलिस ने कलेक्ट्रेट के दरवाजे बंद कर दिए और प्रदर्शनकारियों को गेट के बाहर सड़क पर ही बैठने के लिए मजबूर कर दिया इससे लोगों में आक्रोश फैल गया। पुलिस अधिकारियों ने दलित समाज के लोगों के साथ जानबूझ कर भेदभावपूर्ण व्यवहार किया और बाद में प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग कर वहां से खदेड़ा। अनिल प्रधान का आरोप है कि शांतिपूर्ण धरना दे रहे लोगों पर लाठीचार्ज कराया तथा पुलिस अधिकारियों ने स्वयं भी हाथापाई की, उन्होंने यह भी दावा किया कि इस घटना के बहुत से वीडियो और अन्य साक्ष्य सोशल मीडिया पर उपलब्ध हैं, जो पुलिस कार्यवाही की वास्तविकता को दर्शाते हैं। याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ प्रतिशोध की भावना से कार्यवाही की है। पुलिसकर्मियों की फर्जी चिकित्सीय जांच कराकर दलित समाज के लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमे दर्ज कराए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि पुलिस के पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, इसके बावजूद निर्दोष लोगों को आरोपी बनाया गया है। संविधान और मानवाधिकारों का हवाला देते हुए अधिवक्ता अनिल प्रधान ने अपनी याचिका में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लेख करते हुए बताया कि प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने और अपनी बात रखने का अधिकार है, इसके बावजूद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के मौलिक अधिकारों का हनन किया है। मेरठ पुलिस ने खुलेआम मानवाधिकारों का हनन करते हुए लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचलने का भी प्रयास किया है। अधिवक्ता रवि कुमार गौतम का भी उल्लेख करते हुए आरोप लगाया है कि पुलिस उन्हें धरना स्थल से उठाकर एकांत स्थान पर ले गई, जहां उनके साथ मारपीट करते हुए अमानवीय व्यवहार किया गया। याचिकाकर्ता ने इसे भी मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन का मामला बताते हुए अदालत से पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराने और संबन्धित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विधिक कार्यवाही के आदेश देने की मांग की है। न्यायाधीश एससी/एसटी कोर्ट के निर्णय पर ही सभी की निगाहें टिकी हैं यदि अदालत प्रथम दृष्टया आरोपों को गंभीर मानते हुए मुकदमा दर्ज करने के आदेश देती है तो यह मामला मेरठ पुलिस प्रशासन के लिए बड़ी कानूनी चुनौती बन सकता है। वहीं, पुलिस विभाग की ओर से अभी तक याचिका में लगाए गए आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
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